हंसी ठट्ठा

हास्य एवं व्यंग्य की दुनिया में आपका स्वागत है

53 Posts

6580 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1030 postid : 102

ऐसी आज़ादी से तो गुलामी ही भली थी- राजीव तनेजा

  • SocialTwist Tell-a-Friend

marriage

मुँह में पानी ने जो आना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया…कभी पेट पकड़ कर मन मसोसते हुए..कलैंडर को ताक खुद ही…खुद को थोड़ा सब्र रखने की दकियानूसी सलाह देता तो कभी मनभावन मिठाईयों और पकवानों की वर्चुअल खुशबु के जरिये मुंह में अनायास ही पैदा हो गई लार रुपी चासनी को..एक ही झटके में सटक कर अंदर करते हुए उस ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा को पानी पी-पी कर..जी भर कोसता कि…. “इतनी देर क्यों लगा रहा है कमबख्त…इस नेक काम को असलियत का जामा पहनाने में?”…

मेरी ऐसी  मरमरी सी हालत देख बीवी से रहा ना गया….तुनक के बोली…

“अभी तो सिर्फ न्योता भर ही आया है शादी का और तुम हो कि..लगे बल्लियों उछलने”…

“तो?…मेरे मामा की शादी है…उछलूँ क्यों नहीं?”…

“पता है…पता है…सब पता है…मेरे देखते ही देखते चौथी बार शादी कर रहे हैं…कोई नई बात नहीं है इसमें”बीवी अपने हाथ नचाती हुई बोली …

“तो?…अगर कोई टिक के ही राजी ना हो तो वो क्या करें?”…

“हुँह!…क्या करे?…चुल्लू भर पानी तो मिलता है ना बाज़ार में…उसी में डूब मरे”…

“ब्ब…बाज़ार में?”…

“हाँ!…बाज़ार में…पानी आता ही कहाँ है घरों में आजकल?…सब के सब स्साले…माफिया वाले…कब्ज़ा जमाये बैठे हैं सरकारी नलकूपों पर कि…पैसे दो…तभी भरने देंगे”…

“यहाँ?…दिल्ली में?”…

“नहीं!…राजस्थान में”…

“तो?…उससे हमें क्या फर्क पड़ता है?”…

“अरे!…वाह फर्क क्यों नहीं पड़ता?…बहुत फर्क पड़ता है”…

“वो कैसे?”…

“पानी की कमी के चलते दुखी और परेशान हो वहाँ के लोग जो अन्य शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं”…

“तो?”…

“उनमें से बहुतेरे लोग दिल्ली में भी आ…तम्बू गाड़…अपना डेरा जमा रहे हैं”…

“तम्बू गाड़?”…

“हम्म!…

“तो क्या सिर्फ गरीब-गुरबा लोग ही….अमीर कोई नहीं?…

“मुझे क्या पता?”..

“अभी तुम ही तो कह रही हो”…

“क्या?”..

“यही कि…तम्बू गाड़…

“अरे!…ऐसा सिर्फ कहा जाता है….असलियत में थोड़े ही….

“तो फिर गाड़ने दो ना…क्या फर्क पड़ता है?….दिल्ली तो दिल वालों की नगरी है…सबको हज़म कर लेगी”…

“लेकिन कितने दिनों तक?…ऐसे ही अगर निर्बाध रूप से लोगों का बदस्तूर आना-जाना लगा रहा तो वो दिन दूर नहीं जब तुम एक ही झटके में मुझे ठकुराइन का चोगा छोड़…पलक झपकते ही ठाकरे बन  ‘राज’ करता पाओगे”…

”ठठ…ठकुराइन?…लेकिन तुम तो….

”ठेठ पंजाबन हुई तो क्या हुआ?…काम तो ठाकुरों वाले..ऊप्स!…सॉरी…ठाकरे वाले करूंगी”…

“क्या मतलब?”…

“बहुत हो चूका..’अतिथि देवो भव’ का नारा…अब तो कसम से इन अतिथियों को तबियत से…जी भर पेलने का मन करता है…स्साले!…मेहमान बन के आते हैं और फिर कुछ ही दिनों में हमारी ही छाती पे मूंग दल…सांप बन के लोटने लगते हैं”…

“हाँ!..ये तो है…बाहरी लोगों से निबटने का एक ही तरीका है…इनका एक सिरे से विरोध कर इन्हें दिल्ली से बाहर पटक दिया जाए”…

“स्साले…मेरी दिल्ली…..मेरी शान मिटाने चले हैं”बीवी गुस्से से हुंकार सी भरती हुई बोली..….

”तत्…तुम दिल्ली में पैदा हुई थी?”…

“नहीं!…अमृतसर में…क्यों क्या हुआ?”…

“फिर दिल्ली तुम्हारी कैसे हो गई?”…

“जैसे उस ठाकरे की मुंबई हो गई?”…

“ओह!…

“खैर!…हमें क्या?..कोई मरे या जिए…हमें तो अपने काम से मतलब होना चाहिए”…

“वोही तो”…

“इसलिए तो इतनी देर से समझा रही हूँ तुम्हें कि थोड़ा सब्र से काम लिया करो”….

“मैं कुछ समझा नहीं”…

“और समझोगे भी नहीं”बीवी खीज कर अपने माथे पे हाथ मारती हुई बोली ..

“क्या मतलब?”…

“अरे!..अभी तो पूरे दो दिन पड़े हैं ब्याह को और तुम्हारा  ये हाल हुए जा रहा है..असलियत में जब मौका आएगा तो कुछ खान पड़ेगा नहीं आपसे”..

मैं बोला “अरी!…भागवान..कभी तो अपनी चोंच बन्द कर लिया करो…ये नहीं कि हर वक्त बस…बकर-बकर…ऊपरवाले ने अगर ज़ुबान दे के तुम्हें नेमत बक्शी है तो वो बक्शी है तर माल पाड़ने के लिए…ये नहीं कि जब देखो करती जाओ …बस..चबड़-चबड़ और कुछ नहीं”…

“अरे!…वाह…उलटा चोर कोतवाल को डांटे…इतनी देर से मैं भी यही समझाने की कोशिश कर रही हूँ तुम्हें और तुम हो कि मुझे ही लैक्चर पिलाने लगे?”…

“मैं?…मैं तुम्हें लैक्चर पिला रहा हूँ?”…

“और नहीं तो क्या?….कुछ भी बोलने से पहले ज़रा आगा-पीछा तो सोच लिया करो कम से कम..ये क्या कि बस बोलते जाओ…बोलते जाओ…वो भी बिना किसी तुक के”..

“मैं?…मैं बिना किसी तुक्क के बोल रहा हूँ?”मैं उखाड़ने को हुआ
“जानती हूँ आपको…बातें तो ये लम्बी-चौड़ी जनाब की और जब खाने की बारी आए तो टाँय-टाँय-फिस्स…पिछली बार का याद है ना…जब गए थे शर्मा जी के बेटे की बारात में…क्या खाक माल पाड़ा था?…बस…दो-चार आल्तू-फाल्तू की चीज़ों में ही पेट पस्त हो गया था जनाब का”…
catering_pic

“वव…वो तो दरअसल…उस दिन मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं थी तो….

“अरे!…वो तो मैँ ही थी जो पूरे हफ्ते भर का माल-पानी बटोर लाई थी एक ही झटके में…तुम्हारे भरोसे रहती तो कई-कई दिन फाके में गुज़ारने पड़ते”…

“ये बात तो यार तुम बिलकुल सही कह रही हो…दरअसल…उस दिन मैं थोडा कन्फ्यूज हो गया था कि ….क्या ले जाऊं और क्या नहीं?”…

“इस बार भी कहीं यही गलती फिर से ना कर बैठना…अकेले जा रहे हो…हिम्मत से काम लेना और घबराना बिलकुल भी नहीं”…

“हम्म!…

“ये सोच के कतई परेशान नहीं होना कि मैं तुम्हारे साथ नहीं हूँ”…

“हम्म!…

“और किसी की परवाह नहीं करना कि इसने देख लिया…तो क्या होगा? या उसने भांप लिया तो क्या होगा?”…

“हम्म!…

“और हाँ…खबरदार..जो खाली हाथ घर वापिस आए…घुसने तक न दूंगी…कहे देती हूँ…कसम से”…

“अरे!…यार..चिंता क्यों करती हो?…मैं हर तरफ से अपने आँख…नाक और कान बंद करके इस नेक काम को अंजाम दूंगा..ये देखो…मैंने तो अभी से अपने रूमाल में गाँठ बाँध ली है”…

“हम्म!…वैसे…तुम्हारी करनियों के चलते अकेले भेजने का मन तो नहीं कर रहा है तुम्हें लेकिन अगर मम्मी ने नहीं आना होता इसी हफ्ते तो मैं भी चलती तुम्हारे साथ”…

“हम्म!…

“और हाँ…वो नई वाली जैकेट ले जाना मत भूल जाना कहीं…बड़ी मुश्किल से वाटर-प्रूफ जेबें लगवाई हैँ उसमें गुलाब जामुन और रसमलाई के लिए”…

“हम्म!… (मैं मुंडी हिला अपनी सहमति जताता हुआ बोला)

“और ये नहीं कि ‘वाटर प्रूफ’ जेबों में पकोड़े लाद लो और गुलाब जामुन  दूसरी जेब में कि पूरे रस्ते चासनी टपकती रहे”…

“हम्म!…

“पता है ना पिछली बार कितनी चींटियाँ चिपक गयी थी मिठाई से?…पूरा का पूरा बदन सुजा मारा था कम्भखत मारियों ने काट-काट के”….

“हम्म!…
“एक-एक को मिठाई से उखाड़ कर फैंकने से मिठाई खाना भी कितना बदमज़ा हो गया था ना?”…

“और भला सारी छूट भी कहाँ पायी थी?…आठ-दस को तो निगलना ही पड़ा था”मैं बुरा सा मुंह बनाते हुआ बोला

“वोही तो…ध्यान रखना इस बार कि सबसे पहले किस चीज़ पे हाथ साफ करना है और बाद में किस चीज़ पर”… dsaefdsfd
“हम्म!…

“और खबरदार…जो पनीर के अलावा किसी और चीज़ को अपनी चोंच भी लगाई तो…मुझसे बुरा कोई ना होगा”..

“तो क्या स्नैक्स वगैरा भी ….

“हुंह!…तुम्हारे ये साँप(स्नेक्स) तुम्हीं को मुबारक…मेरे लिए तो तुम…

“स्प्रिंग रोल लेता आऊँ?…बड़े स्वाद होते हैं सच्ची…कसम से”मैं चटखारा लेता हुआ बोला….

“हुंह!..स्प्रिंग रोल लेता आऊँ…घोड़ा जब भी करेगा…लीद की ही बात करेगा”…

?…?…?…?

“अरे!..खानी है तो कोई ढंग की चीज़ खाओ…ये क्या…कि बस यूँ ही मज़ाक-मज़ाक में उलटी-सीधी चीज़ों से स्वाद-स्वाद में ही निबट लो?”…

“लेकिन दावत में तो….

“हुंह!…दावत में तो….अरे..ये भी कोई दावत है?…..दावत तो होती थी हमारे टाईम में…महीने भर पहले ही जा धमकते थे न्योता देने वालों के यहाँ कि…
“ले बेटा!..कर ले सेवा-पानी जितनी तेरी श्रद्धा है…हमारा आशीर्वाद तेरे साथ है”…

“हम्म!…

“अब तो बस नाम भर का ही रह गया है ये मिलना-मिलाना”…

“हम्म!…

“किसे फुर्सत है अब एक दूसरे का हाल-चाल पूछने की?…अब तो बस…जाओ…शक्ल दिखाओ…थोड़ा बहुत पेट में ठूसो-ठासो  और लिफाफा थमा…अपनी डगर चलते बनो”….

“हम्म!…

“ऊपर से ये मुय्या प्लेट सिस्टम….खाने का तो मज़ा ही बिलकुल बदमज़ा सा  होता जा रहा है आजकल….ये भी क्या बात हुई कि बस…चुपचुपाते हुए खाने-पीने का आर्डर करो..थोड़ी-बहुत अंटी ढीली करो और हो जाओ मिनटों में ही फ्री”…
“और नहीं तो क्या?…ये भी क्या बात हुई कि पड़ोसियों तक को भी ना पता चले कि कोई दावत-शावत का प्रोग्राम इनके यहाँ?…कितना इन्सलटिड सा फील होता है ना जब तक घर के आँगन से मनभावन पकवानों की महक ना उठे…तंदूर से काले-घने…और गहरे-पीले रंग के धुंए के गुबार ना उठे”..

“हुंह!…गुबार ना उठे…तो आग लगा लो  ना सीधे-सीधे अपने घर को…लाल रंग का भी दिख जाएगा”…

“म्म…मैं तो बस…

“देख!…कैसे मिमिया रहा है…पागल का बच्चा…जब भी बात करेगा…पुट्ठी ही करेगा”बीवी अपने माथे पे हाथ मार…दीवार पे टंगी मेरी माँ कि तस्वीर को देख बुरा सा मुंह बनाते हुए बोली

“अरे!…कमाल करती हो तुम भी…म्म…मैं तो बस यही कहना चाहता था कि…ये स्साले…‘केटरिंग’ वाले बड़े ही चालू होते हैं…जब रेट फाईनल करने का वक्त होता है तो…

“जी!..ये-ये परोसेंगे…और…वो-वो भी परोसेंगे”…

“माँ….दा…सिर्…परोसेंगे…स्साले…इतनी लंबी-चौड़ी लिस्ट रट्टू तोते के माफिक सुना डालते हैं कि बन्दा  तो बस बावला हो उनकी ही डायलाग बाज़ी सुनता रहे”…
“और नहीं तो क्या?..स्साले!…बातों की ही खाते हैँ और…बातों की ही खिलाते हैँ”..
“और बन्दा बेचारा…ये सोच के चुप लगा जाता है कि …कोई कसर बाकी न रह जाए कहीं..इज़्ज़त जो प्यारी होती है सब को”…

“किसी को अपनी बिटिया के हाथ पीले करने होते हैँ तो किसी को अपने पैसे की नुमाईश और इसी चक्कर में ये तक भूल जाते हैं कि कम्भख्त..स्साला…पेट तो एक ही है…क्या-क्या ठूसा जाएगा इसमें भला?”…
“और ईमानदारी की बात तो ये कि…बन्दा अगर ढंग से खाने बैठे तो एक या दो आईटम में ही पेट टैं बोलने को होता है लेकिन वो कहते हैं ना कि लालच बुरी बला है…सो!…खाने वाला सोचता है कि…अपने बाप का क्या जा रहा है?…थोड़ा खाओ…थोड़ा फैंको”
“चीज़ पसन्द भी आ जाए बेशक…लेकिन जैसे दूसरे की बीवी ज़्यादा सुन्दर लगती है…ठीक वैसे ही दूसरे की प्लेट में पड़ा खाना ज्यादा लज़्ज़तदार दिखाई देता है…इसलिए एक कौर मुँह में डाला नहीं कि बाकि सारा सीधा डस्टबिन का मुंह ताकता नज़र आता है”…

“और फिर से नयी प्लेट में नयी आईटम ये सोच के कि…पट्ठे के पास दो नंबर का बड़ा माल है…कुछ तो कम हो”…

“हाँ!..कुछ तो कम हो वर्ना टैक्स-वैक्स के लपेटे में आ गया तो वैसे ही लेने के देने पड जाएंगे…कुछ तो भला हो किसी का”
“और वैसे भी हर कोई सोचता है कि…कौन सा उसकी जेब से नोट लग रहे हैं जो वो एक ही प्लेट में सब कुछ खाने की सोचे?”…

“स्साले!…इतना रंग-बिरंगा और खुशबूदार माल सजा देते हैं सामने टेबलों पे कि ना चाहते हुए बन्दा खाने का ऐसा हाल कर बैठता है जैसा किसी ज़माने में दिल्ली की ‘डी.टी.सी’ बसों में सवारियों का हुआ करता था….पनीर के ऊपर गोभी चढी दिखाई देती है तो नीचे से दही-भल्ला बांग दे अपनी आफत खुद बुला रहा होता है”….
“और दाल मक्खनी जो चुपके से सरकती हुई अपनी एंट्री अभी दर्ज करवाने में सफल होती ही है कि पापड़ बेचारा अपनी किस्मत का रोना ले के बैठ जाता है कि… हे ऊपरवाले…मुझे इतना कमज़ोर क्यों बनाया कि मैं अपनी रक्षा खुद ना कर सकूँ?”..

“अब इसमें हम क्या कर सकते हैं?..सब अपनी-अपनी किस्मत की बात है”…

“कटौती तो कर सकते हैं”…

“क्या मतलब?”..

“शादी-ब्याह और ऐसी ही दूसरे मौकों पर इतना ही परोसा जाए..जितने की लागत हो…पैसे का पैसा बचेगा और अन्न का अपमान भी नहीं होगा”…

“हम्म!…बात तो तुम सही कह रही हो लेकिन इस निष्ठुर और निर्दयी ज़माने का क्या करेंगे?…लोग क्या कहेंगे?”…

“लोगों का काम क्या है?”…

“कहना”…

“तो फिर उसे कह-कह के अपनी भड़ास निकाल लेने दो ना…कौन रोकता है?”…

“बात तुम्हारी सही है लेकिन इतने सालों से ये जो एडियाँ रगड़-रगड़ के लोगों ने दो नंबर का पैसा इकठ्ठा किया हुआ है…उसका क्या करेंगे?”…

“अरे!…अगर इतनी ही ज्यादा उछल-कूद हो रही है खीस्से में तो कंपनी से किसी नामी-गिरामी रेस्टोरेंट के मील वाउचर छपवा के ही बंटवा दो मेहमानों में कि वे अपनी साहुलियत के हिसाब से उन्हें जब जी चाहे खर्च कर…फुल्ली एंजाय कर सकें”…

“तुम क्या सोचती हो?…इतना आसान है ये सब?…मेहमान तो चलो राजी भी हो जाएंगे थोड़ी ना-नुकुर के बाद लेकिन ये सोचो कि क्या हम खुद…अपनी ही सोच को बदलने के लिए इतनी आसानी से तैयार हो जाएंगे?”…

“हम?…हम भला अपनी सोच क्यों बदलने लगे?..अपना तो बस एक ही सीधा-साधा सा फंडा है…राम नाम जपना और पराया माल अपना“…

”अरे!…अपनी बात नहीं कर रहा हूँ”..

“तो फिर?”…

“उनकी बात कर रहा हूँ जिनको मेहमाननवाजी का शौक चर्राया रहता है हर हमेशा”…

“ओह!…तुमने तो मुझे डरा ही दिया था”…

“शायद!…नहीं”…

“क्या…नहीं?”..

“यही कि इतनी आसानी से वो लोग अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं होंगे”…

“भले ही वो दकियानूसी क्यों ना हो?”..

”बिलकुल”…

“खैर!…हमें क्या?…हम तो इसमें भी राजी-खुशी हैं और उसमें भी राजी-खुशी हो जाएंगे”…

इसी तरह दावत की बातें करते-करते दो दिन कैसे गुज़र गए…पता भी ना चला…अब तो बस एक रात ही बची थी बीच मेरे और मेरे महबूब याने के गुलाब जामुनों के बीच में…वो मेरे दर्शन को तरस रहे थे और मैं उनका सानिध्य पाने को बेताब ….अगले दिन सुबह छह बजे की ट्रेन थी…इसलिए मोबाईल में अलार्म लगा मैं जल्दी ही सोने को चला गया…सोचते-सोचते कब आँख लगी कुछ पता नहीं…

रात को पता नहीं किस कमबख्त का चौखटा देख के बिस्तर का मुंह ताका था कि सुबह अलार्म भी पूरा ढेढ घंटा देरी से बजा | हडबडा कर फटफटा तैयार हुआ और एक झटके में भाग लिया स्टेशन की तरफ…घर के नज़दीक ही था…इसलिए यकीन था कि दस-बारह मिनट की तेज चाल के बाद मैं अपनी मंजिल को पा ही लूँगा लेकिन  पता नहीं कैसा मनहूस दिन था ये आज का जो मेरे साथ हर वक्त बुरा होता जा रहा था?..

एक तो पहले घर से निकलते ही बिल्ली रास्ता काट गई और ऊपर से ना चाहते हुए भी मेरा पेट कुछ-कुछ खराब हो चला था | पता नहीं बीवी किस भण्डारे से माल-पानी ले आई थी हफ्ता भर पहले?….कल तक तो ठीक ही था…एक दिन में ही इतना बिगड़ जाएगा…सोचा ना था…पहले पता होता तो सारा का सारा कल ही चट कर जाता…

अब रह-रह के पेट में गुड़-गुड़ सी हो रही थी लेकिन..एक तो ट्रेन के छूट जाने का डर और उसकी एवज में बीवी के हाथों बेलन की मार पड़ने का डर…मैं बिना रुके स्टेशन की तरफ सरपट दौड़ता चला जा रहा था …शोर करते इंजन की आवाज़ सुनते ही मेरे पैरों में बिजली सी भर उठी और मैं ये जा और वो जा….बड़ी मुश्किल से ट्रेन के आखिरी डिब्बे को पकड़ पाया …जल्दबाजी में ये भी पता नहीं चला कि कम्पार्टमैंट लेडीज़ है या फिर जेन्ट्स….आव देखा ना ताव और झट से भाग लिया टायलेट की तरफ…दरवाज़ा अंदर से बंद था…बहुत खटखटाया लेकिन कोई फायदा नहीं | आखिर में तंग आ के ऊपर रौशनदान से झाँकने की कोशिश की तो पीछे से आ रही जनाना आवाज़ों ने ध्यान बांट दिया…..

“बचाओ….बचाओ…पुलिस…पुलिस”…की सी आवाजें सुनाई दे रही थी…किसी अनहोनी की आशंका से पलट के देखा तो सब कम्भखतमारियों का इशारा मेरी ही तरफ था…हडबडाहट में कहाँ कूदा…कैसे कूदा..कुछ याद नही….बस सीधा सरपट भाग लिया दूसरे डिब्बे की तरफ लेकिन…हाय री…मेरी फूटी किस्मत…सामने से हवलदार समेत टी.टी आवाज़ें सुन के इधर ही चला आ रहा था…साथ में कई और ठुल्ले भी थे| मुझे भागते देख वो भी मेरे पीछे लपक लिए और धर दबोचा मुझ मासूम को किसी मुर्गे के माफिक…

“स्साले!..लेडीज़ को छेड़ता है?…अभी सिखाते हैँ तुझे सबक कि कैसे छेड़ा जाता है लेडीज़ को”हवलदार चिल्लाया …

“चल!..टिकट दिखा” टी.टी भी कौन सा कम था? ..

मैँ चुप…मेरे पूरे खानदान में कभी किसी ने टिकट नहीं लिया तो मैं भला क्यों लेने लगा?…फ़ालतू के पैसे नहीं हैं अपने पास कि मुफ्त में लुटाते फिरें…इसलिए…जेबें टटोलने का नाटक करते हुए बहाना बना डाला…

“जी!…ल्ल…लगता है कि जल्दबाज़ी में स्टेशन पे ही गिर गयी”…
“हम्म!…..(मेरे सूट-बूट का एक्सरे करने के बाद सबकी आँख बचा के हवलदार ने जेब गर्म करने का इशारा किया..

अब अपनी जेब में भला बीवी ने कभी कुछ टिकने दिया है जो आज बक्श देती?…दो-चार रूपए की चिल्लड़ के अलावा कुछ भी नहीं था मेरे पास…तो उसकी जेब कैसे गर्म करता? “और अगर कुछ होता भी तो क्या मैं उसकी जेब गर्म कर देता?”…

“शायद!…नहीं”…

इसलिए…जेब गर्म करने का तो भैय्या …सवाल ही पैदा नहीं होता…सीधे-सीधे ….साफ-साफ शब्दों में हाथ खड़े कर दिए उसके सामने और मिमियाते हुए स्वर में बोला कि…

“मेरा पेट खराब है..मुझे ‘टायलेट’ जाने दो…प्लीज़”…

हवलदार को गुस्सा तो मेरी कंगली हालत देख पहले से ही चढा था,बोला…

“स्साले!…एक तो बिना टिकट…ऊपर से लेडीज़ कम्पार्टमेंट… और अब जनाब टायलेट भी लेडीज़ का ही इस्तेमाल करना चाहते हैँ”…

“तो?”पेट दर्द तो पहले से ही हो रहा था…ऊपर से ऐसा कोर जवाब सुन मैं बौखला उठा

“इसे कहते हैँ…’एक तो चोरी…ऊपर से सीना जोरी” टी.टी को भी ताव आ चूका था…

“तो?…अगर तकलीफ हो रही है तो मैं क्या करूँ?…क्या यहीं पे…(मैं बेशर्म हो उकडूँ बैठने को हुआ)…

“अर्र…क्या कर रहा है?…पागल है क्या?”भीड़ में से एक औरत चिल्लाई…

“अब जो मर्जी समझ लो…कंट्रोल नहीं हो रहा है तो मैं क्या करूँ?”मैं भी बेशर्मी पे उतर आया …

“थोड़ा सब्र तो रख बेट्टे…अगला स्टेशन आने वाला है…कंट्रोल करना तो हम सिखा देंगे तुझे”हवलदार का कड़क से सौम्य होता हुआ स्वर …

“वो कैसे?”..

“तेरे जैसे ड्रामे के लिए तो हमने स्पैशल जुगाड़ बनाया हुआ है”…
“टायलेट का?”मेरी आँखों में चमक उत्पन्न होने को हुई…

“हाँ!….इसी बात की तो तनख्वाह मिलती है हमें” …

“लोगों को टायलेट कराने की?”ना जाने क्यों ऐसी हालत के बावजूद भी मैं मसखरी करने से बाज़ नहीं आया

“सब पता चल जाएगा…तू चल तो सही”…

“जी!…

“और कितनी देर लगेगी?”पेट में हो रही ऐंठन से परेशान मैंने व्याकुलता भरे स्वर में पूछा..

“बस!…दो मिनट और…स्टेशन आया ही समझ…आधा घंटा रुकेगी ट्रेन यहाँ..आराम से निबट लेइओ”…

“बस!…कोई पहले से ना घुसा हो”मेरे परेशान चेहरे को देख टी.टी.हँसता हुआ बोला

हा…हा…हा…

वो हंस रहे थे और मैं परेशान हो रहा था…मेरी परेशानी देख…एक तरस खाते हुए बोला….

“चिंता ना कर…कोई होगा भी तो उसे जबरन बाहर निकाल तुझे अंदर घुसा देंगे”…

“ओह!…थैंक्स….

“इसमें थैंक्स की क्या बात है?…आप जैसे देश के जिम्मेदार नागरिकों की सेवा करना तो हमारी ड्यूटी है…हमारा कर्तव्य है”…

“हम्म!…लगता है हमारी रेलमंत्री ने काफी सख्ती कर रखी है इन पर…तभी ये ऐसे बैंत के माफिक सीधे हुए पड़े हैं”मैं मन ही मन सोचने लगा

स्टेशन के आते ही मेरे चेहरे पे एक चालाकी भरी मुस्कान जन्म ले चुकी थी…इरादा जो नेक नहीं था मेरा….
“इस  हवलदार के बच्चे को यहीं चकमा दे नौ दो ग्यारह हो जाउंगा…एक बार जो इसकी पकड़ से छूट गया तो पुन्जा भी नहीं पाड़ पाएगा मेरा”…

“लेकिन…उफ़!…ये स्साला भी किसी कमीने से कम नहीं…इरादा भांप गया था शायद मेरा…इसीलिए ज़बरदस्ती सारे कपड़े उतरवा बन्द कर दिया पट्ठे ने एक सड़ियल से टायलेट में बन्द कर दिया मुझे | मैने भी सोचा कि पहले ज़रूरी काम से तो फारिग हो ही लूँ…फिर कुछ ना कुछ कर के निबटता हूँ इस कमबख्त से…लेकिन ये क्या?…ये क्या देख रहा हूँ मैं?….ऐसा कैसे हो सकता है?…आज़ाद देश में रह रहे हैं हम…ऐसा घिनौना बरताव तो कभी अंग्रेजों ने भी नहीं किया हमारे साथ…ऐसी आज़ादी से तो गुलामी ही भली थी…

हाँ!…ऐसी आज़ादी से तो गुलामी ही भली थी

***राजीव तनेजा***

rajivtaneja@gmail.com

http://hansteraho.blogspot.com

+919810821361

+919213766753

+919136159706

| NEXT



Tags:               

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

330 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



अन्य ब्लॉग

  • No Posts Found

latest from jagran