हंसी ठट्ठा

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घूमती है दुनिया..घुमाने वाला चाहिए-राजीव तनेजा

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sms..............

“आय हाय!….आज फिर कबाड़ उठा लाए?” बीवी D.V.D  भरे लिफ़ाफे को गुस्से से पलंग पे पटकते हुए बोली

“कुछ अक्ल-वक्ल भी है कि नहीं?…अभी पिछ्ली वाली तो देखी नहीं गयी ढंग से…ऊपर से और उठा लाए?…फ्री में बंट रही थी क्या?”…

“व्वो!…दरअसल….

“हमेशा पैसे उजाडने की ही सोचा करो..ये नहीं की कुछ ऐसा काम करो कि नोटों की बारिश हो…उल्टे जो थोड़े-बहुत बचे हैं उनका भी बँटाधार करने पे तुले हो”बीवी जो एक बार शुरू हुई तो बिना रुके बोलती चली गयी….

“अरे!…यार..सस्ती मिल रही थी तो….

“सस्ती मिल रही थी तो पूरी दुकान ही उठा लाए?…अब तुम भी ना..पता नहीं कब अक्ल  आएगी तुम्हे?..जो चीज़ देखते हो सस्ती…तुरंत थोक के भाव में उठा लाते हो…बाद में भले ही बेशक पड़ी-पड़ी सड़ती फिरें तुम्हारी बला से”…

“ल्लेकिन..मैं तो….

“अब..उस दिन आलू क्या दो रुपए किलो मिल गये?….पूरी बोरी ही कंधे पे लाद लाए…कुछ मेरी भी इज्ज़त का ख्याल करो”…

“लेकिन मैं तो…

“मैं तो तंग आ चुकी हूँ रोज-रोज आलू बनाते और खाते…अपना हफ्ते में एक-आध बार की बात हो तो मन मार के…

“अरे!..यार…बच्चों को पसंद हैं तो मैंने सोचा कि….

“तो क्या उन्हें भी तोन्दुमल बना डालोगे अपनी तरह?…कुछ तो ख़्याल किया करो अपना और अपनी सेहत का…कोई फ़िक्र है ही नहीं जनाब को…सब की सब टैंशन मेरे ही ज़िम्मे जो सौंप रखी हैं…ये नहीं कि कोई अच्छा काम करते और नोट कमाने का बढिया सा जुगाड़ ढूँढते…ये क्या कि हर वक़्त बस नोट फूँकने के ही एक से एक नए तरीके तलाशते रहते हो?”….

“ल्लेकिन….

“अरे!…पूरी दुनिया दिन दूनी और रात चौगुनी तेज़ी से लखपति हुए जा रही है और तुम हो कि करोड़पति से लखपति पे आ गये…अब क्या कंगाल होने का इरादा है?”..

मुझसे रहा ना गया और दाँत पीसते हुए बोला…“बड़ी अपने आप को अक्लमंद समझती हो तो फिर तुम ही कोई आईडिया क्यूं नहीं दे देती खुद ही कि कैसे रातों-रात लखपति बना जाए?” ..

“इसमें भला कौन सी बड़ी बात है?” बीवी ने तपाक से उत्तर दिया….

“रेडियो..टी.वी ना देख के इन मुय्यी फिल्मों के चक्कर में अपनी रातें काली करते फ़िरोगे तो यही होगा ना?…ना दीन-दुनिया की ख़बर और  ना ही किसी और चीज़ की फ़िक्र…बस!…खोए रहते हैं जनाब इस मुय्यी ‘ऐश्वर्या’ के चक्कर में”…

“तो?…इससे मेरे पैसे कमाने का क्या कनेक्शन?”…

“अरे!..बीस-बीस बार एक ही फिल्म देखने से गोद में नहीं आ बैठेगी तुम्हारे ….तुम्हारी किस्मत में मैं ही लिखी हूँ…अब चाहे हँस के…चाहे रो के झेल लो..झेलना तो तुम्हें पड़ेगा ही”…

“लेकिन मैं तो बस ऐसे ही…महज़ टाईमपास के लिए…….

“ख़बरदार!…जो किसी गैर…परायी नार की तरफ़ आँख उठा के भी देखा तो..बेशक टाईमपास के लिए ही सही….वहीं के वहीं खींच के ऐसा बेलन मारूंगी कि सर पे पट्टी बांधे डोलते फ़िरोगे इधर-उधर” वो फिर जो शुरू हुई तो रुकने का नाम नहीं लिया ….

मुझे मजबूरन बीच मैं टोकना पड़ा….. “तुम तो लखपति बनने के जुगाड़ बता रही थी….क्या हुआ?” …

“कहाँ गया आइडिया?…बस!…निकल गई हवा?”…

“हाह!…कहना कितना आसान है?..बस मुँह खोला और झाड़ दिए दो-चार लेक्चर..इसमें कौन सा टैक्स लग रहा है?”….
बीवी ग़ुस्से से मेरी तरफ़ देखती हुई बोली… “अरे!…बेवकूफ़ अकल लड़ा और S.M.S भेज”…

sms

“S.M.S भेज के अक्ल लड़ाऊँ?”…

“हाँ!…

“ये कौन सा तरीक़ा है लखपति बनने का?” …

“अरे!…बाबा…रोज़ तो आ रहा होता है टी.वी के किसी ना किसी चैनल पे कि फलाना और ढीमका लिख के फलाने-फलाने नंबर पे S.M.S करो और लाखों के ईनाम पाओ”…

“तो?”…

“अब कल ही तो आ रहा था एक चैनल पे कि ‘जैकपाट’ लिखो और फलाने नंबर पे S.M.S करो …पता नहीं कितने लोग तो लखपति बन भी चुके होंगे अब तक और हम हैं कि हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं वहीं के वहीं” बीवी का मायूस स्वर…

“ओह!…तो क्या सचमुच में….

“और नहीं तो क्या मैं झूठ बोल रही हूँ?…कुछ एक का तो नाम भी बार-बार अनाउंस कर रहे थे पट्ठे और एक-दो का तो फोटू भी छपा देखा था मैंने अखबार में”

“पता है कितना खर्चा है एक S.M.S भेजने का?”कुछ सोच…तिरछी नज़र से बीवी को व्यंग्यात्मक ढंग से  देखते हुए मैं बोला…

“कितना?”…

“पूरे दस का नोट स्वाहा हो जाता है एक ही बार में”…

“तो?…उससे क्या होता है?…दस का नोट ही तो लगता है बस..इससे से कहीं ज्यादा तो हमारे देश का एक आम आदमी भी हर रोज पान…गुटखे और तम्बाखू के साथ चैन से मज़ा लेता हुआ चैनी-खैनी में ही उड़ा देता है”….

“अरे!…कुछ नहीं है बस..’फुद्दू’ खींच डाल रहे हैं सरासर और पब्लिक है कि मानो जन्म से ही इस सब के लिए तैयार बैठी हो कि….
“आओ!…भाईजान…आ जाओ…बताओ कहाँ मत्था टेकना है?”…

?..?…?..?

“अरे!…घूमती है दुनिया…बस घुमाने वाला चाहिए” …

“दस-दस कर के पता नहीं कितने का गेम बजा डालते हैं हर रोज और बस दिखावे के लिए आठ-दस लाख पब्लिक में बाँट …उसे राज़ी कर अपने कर्तव्य से…अपनी जवाबदेही से मुक्त हो लेते हैं”…

“बस!..आठ-दस?…बाकी सब का क्या होता है?” बीवी उत्सुकता से मेरी तरफ ताकती हुई बोली

“डकार जाते हैं स्साले खुद ही”…

“लेकिन!..पैसा तो मोबाइल कंपनी वालों को ही मिलता है ना?…’रेडियो-टी.वी वालों को भला इसमें क्या फ़ायदा?”…

“क्या फायदा?….अरे!…ये सब स्साले एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैँ…मिलीभगत रहती है इन सबकी…इस हमाम में सभी नंगे हैँ चाहे वो टी.वी वाले हों या फिर हो और कोई…सभी मिल-बाँट के खाते हैँ…सबका हिस्सा होता है इसमें”…

“ओह!…

“लेकिन…हाँ!…एक बात की तो दाद देनी ही पड़ेगी….

“वो भला क्या?”..

“होते स्साले बड़े ही ईमानदार हैँ”…

“ईमानदार?”…

“हाँ!…

“भांग तो नहीं चढ़ा रखी कहीं तुमने?…अभी-अभी तो कह रहे थे कि…सब स्साले चोर हैं”…

“तो?”…

“अगर ये बात सही है तो अब अपनी इस पुख्ता सोच के विपरीत ये क्या अंट-संट बके चले जा रहे हो?.. किसी एक बात पे तो टिका करो कम से कम”…

“अरे!…कमाल है…ईमानदारी का ठेका क्या सिर्फ हमारे नेताओं और पुलिस वालों ने ही लिया हुआ है?…कोई और इसमें भागीदार नहीं हो सकता क्या?”…

“लेकिन….

“और ये तुमसे किस गधे ने कह दिया कि चोर ईमानदार नहीं होते?”…

?…?…?…?

“पट्ठे…एक-एक पैसे का…एक-एक पाई का हिसाब एकदम इस तरह से एकूरेट रखते हैँ कि किसी भी तरह की कोई कमी या मीन-मेख निकलने की गुंजाईश ही ना रहे”…

“हम्म!…

“जिसका जितना हिस्सा बनता है…बिना मांगे ही तुरंत पहुँच जाता है उसके वैध-अवैध खाते में” ..

“हम्म!..

“और तो और अब इन मुय्ये अखबार वालों को भी चाव चढ चुका है इस कंभखत मारी S.M.S नाम की बिमारी का…वो भी कूद पडे हैँ इस गोरख-धन्धे में”…

“ओह!…

“बेशक कोई बात हो या ना हो…S.M.S के जरिए सबकी वाट लगाने को तैयार बैठे रहते हैँ हमेशा”…

“वो कैसे?”…

“अब तू खुद ही बता कि राहुल महाजन ने अपने बीवी को झापड़ रसीद कर दिया तो बता कि इनके बाप का क्या गया?”…

“कुछ नहीं”…

“लेकिन फिर भी पब्लिक को बोलते हैं कि बताओ…“एक झापड़ मारा कि दो झापड़ मारे?…अगर एक झापड़ मारा तो ‘A’ लिख के और अगर दो झापड़ मारे तो ‘B’ लिख के फलाने-फलाने नंबर पे भेजो…इनाम मिलेगा”…

“हुँह!…तुम तो बस सुनी-सुनाई बातों पे विश्वास कर लिया करो”…

“नहीं!…सच्ची कह रहा हूँ…कसम से…मैंने खुद ही तो अपनी इन्हीं आँखों से सुना था कि…

“लो!…अब तुम्हें आँखों से भी सुनाई देने लगा…धन्य हो गई रे मैं तो”…

“म्म…मेरा मतलब था कि इन्हीं कानों से टी.वी देखते हुए सुना था कि….

“दयिय्या रे…दयिय्या…अब तो इसे कानों से दिखाई भी देने लगा”…

“म्म…मेरा मतलब था कि इन्हीं आँखों से टी.वी देखते हुए मैंने अपने कानों से सुना था कि…

“तो फिर जा के किसी अच्छे डाक्टर से इलाज करवाओ अपने इन ज्यादा सुनने वाले कानों का”…

“क्या मतलब?”…

“अरे!…वो पूछ रहे थे कि… “झापड़ दाएँ गाल पे मारा था कि…बाएँ गाल पे मारा?”..और तुम हो कि कह रहे हो कि एक मारा था या फिर दो मारे थे?”…

“अरे!…कुछ भी हो…क्या फर्क पड़ता है?…झापड़ तो मारा ही था ना?”..

“अरे!..वाह…फर्क कैसे नहीं पड़ता?…बहुत फर्क पड़ता है”…

“ओ.के!…ओ.के मेरी अम्मा वो दायाँ-बायां ही पूछ रहे थे बस…अब खुश?”…

“हाय-हाय!…मैं लुट गई…मैं बर्बाद हो गई….मेरा ते कक्ख वी नय्यी रेहा”….

?…?..?..?

“हाय-हाय!…मैं लुट गई…मैं बर्बाद हो गई….मेरा ते कक्ख वी नय्यी रेहा”….

“अरे!…हुआ क्या?…कुछ बताओगी भी कि ये एक ही डायलाग दो-दो बार क्यों मारा जा रहा है?”…

“मैं तुम्हें अम्मा दिखाई देती हूँ?”…

“अरे!…व्वो?… वो तो बस ऐसे ही मुंह से निकल गया था”…

“तो फिर संभाल के रखा करो अपने मुंह को”..

“ओ.के…बाबा”..

“हम्म….

“क्या पता ये सब भी इन्हीं की मिलीभगत हो?”…

“राहुल और डिम्पी की?”..

“नहीं!…इनके साथ टी.वी वालों की”…..शाही खर्च हैं पट्ठे के और पब्लिसिटी का भूखा भी है”….

“हम्म!…उन्हें पब्लिसिटी की ज़रूरत है और इन्हें पैसे की…क्या पता आपस में एक-दूसरे के साथ संगम कर के ये आम जनता का फुद्दू खींच रहे हों?”…

“बिलकुल!…होने को तो कुछ भी हो सकता है”…

“चाहे प्रोग्राम कोई सास-बहू टाईप का रोने-धोने वाला हो या कोई हँसते-हँसते गुदगुदाने वाला या फिर कोई बेतुकी खबरों का सबसे ‘तेज़ चैनल’ ही क्यों ना हो?…सभी के सभी लूटने में मस्त हैँ”…

“बिलकुल!…इनका बस चले तो निचोड़ ही डालें आम आदमी को”…

“थोड़े से ईनाम का झुनझुना दिखा के लार टपका डालते हैँ आम आदमी की और फिर जेब का ढीला होना तो लाज़मी है ही”…

“हम्म!…
“अब पहले तो किसी एक बंदे को यशभारत की मेगा फिल्म में गाने के साथ-साथ पूरे एक करोड़ का लालीपाप दिखाओ और बाँध डालो एग्रीमैंट के चक्कर में कि ….
“ले बेटा!…अब तू अपना आराम से गा और बजा….इंडिया का आईडल जो है तू”…

“मानो इनसान ना हुआ कोई गाय-भैंस हो गयी कि पूरे एक साल तक जी भर के दुहो…बाप का राज जो है”..

“लेकिन किस्मत तो जाग उठेगी ना उसकी जो आईडल बन जाएगा पूरे देश का?…सुना है कि टाटा वाले अपनी नई गाड़ी WINGER भी मुफ्त में दे रहे हैं उसे”…

“चलो!…माना कि किस्मत जाग उठेगी…प्ले बैक सिंगर बन जाएगा…गाड़ी भी मिल जाएगी लेकिन  किनकी जेबों की कीमत पर?”…

“किनकी?”…

“पानी तो हमारी-तुम्हारी जेबों पर ही फिरेगा ना?…गाड़ी की कीमत बढ़ जाएगी और…

“हम्म!…

“इस सारे गोरखधंधे में पता नहीं कितनों की जेबें ढीली होंगी और कितनों की तिज़ोर्रियाँ भरेंगी?..इसे बताने वाला कोई नहीं”…

“हम्म!…

“अगर गलती से कुछ बाँट-वांट भी दिया तो कौन सा उनके बाप का गया?…चैनल की ‘टी.आर.पी’  बढ़ी और उसके जरिए कमाई”…

“हम्म!…

“स्सालों ने अपनी किस्मत खुद ही बना डाली है अपने आप और पब्लिक है कि…ऊपरवाले के भरोसे बैठी है कि वो ही आएगा और अपनी मेहर कर….उनकी किस्मत संवारेगा एक दिन”…

“हम्म!…

“अरे!…बेवाकूफो… लुटना ही तुम्हारी नियति है और लुटना ही तुम्हारी किस्मत…कर सकते हो तो अपने बचाव में खुद ही कुछ करो…बाहर से कोई नही आएगा तुम्हें बचा…तुम्हारा बड़ा पार लगाने”…

“हम्म!…तो इसका मतलब ये तो एक ऐसी लूट है जिसे कोई रोकने वाला नहीं…कोई टोकने वाला नहीं”…

“नहीं!…ऐसी बात नहीं है…करने को तो अपनी सरकार कुछ भी कर सकती है…इसके खिलाफ क़ानून बना उसे पूर्ण रूप से लागू कर सकती है लेकिन ऐसा करने की इच्छाशक्ति हो…तब ना”…

“क्या पता उसके मातहतों तक भी इस सब का हिस्सा पहुँच जाता हो?”…

“बिलकुल!…होने को तो कुछ भी हो सकता है”..

“उफ़!…क्या होता जा रहा है हम हिंदुस्तानियों की समझ को?…साफ़-साफ़ समझते हुए भी हर चीज़ से अनजान बन रहे हैं…पागल बन रहे हैं”…

“अरे!…अरे रुको…सिर्फ अपने हमवतनों को ही क्यों कोस रही हो इस सब के लिए?…ये मत सोचो कि ऐसे बावले सिर्फ हिन्दोस्तान की सरज़मीं पर ही पैदा होते हैं…पूरा संसार ही भरा पड़ा है ऐसे नामुरादों की जमात से?”…

“वो कैसे?”..

“अब तुम खुद ही देखो ना कि कुछ गिने-चुने…सरफिरे टाईप के बन्दों ने दिमाग लड़ाया और पलक झपकते ही पूरी दुनिया को शीशे में उतार कुछ ही दिनों में अपना उल्लू सीधा कर डाला”…

?…?…?…?

“स्साले!…खुली आँखो से ऐसे काजल चुरा ले गये कि किसी को कानों कान खबर ही नहीं”…

“मैं कुछ समझी नहीं”…

“उन स्साले…*&^%$%#$% के जनों ने ‘सात अजूबों’ के नाम पे एक वैब साईट बनाई और पूरी दुनिया को चने के झाड पे चढा पे कहने लगे कि ‘वोट’ करो और साबित करो कि दुनिया के सात अजूबे कौन-कौन से हैँ?” …

“ओह!…

“इन स्साले नमूनों के चक्कर में S.M.S भेज-भेज के पूरी दुनिया खुद ही सबसे बड़ा नमूना बन बैठी…ये भी नहीं सोचा किसी ने कि…

  • ये स्साले कौन होते हैं इस सब को तय करने वाले?”…
  • ना ये U.N.O से हैं और ना ही किसी विश्व-व्यापी अधिकृत संस्था से जिसे ये सब तय करने का अधिकार हो

“स्सालो!…ये जो सबकी जेबों पे ये तुमने खुलेआम डकैती मारी है…इसकी भरपाई कौन करेगा?”…

“तुम्हारा बाप?”

“हम्म!…लेकिन ऐसे-कैसे पूरी दुनिया के लोग…जानबूझ के एक साथ अपनी जेबों से पैसे निकाल उन्हें स्वाहा कर डालते हैं?”…

“यही तो कमाल की बात है कि इन स्सालों ने आपस में मिल के ऐसा फूल-प्रूफ जुगाड़ बना डाला है कि….सब के सब मरीज़ बने बैठे हैँ इस S.M.S रूपी बिमारी के…जेब से हर पल नोट खिसकते ही जा रहे हैं लेकिन किसी को कोई फिक्कर-ना-फाका”…

“उलटे बन्दे को ये खुशफहमी और दे डालते हैँ कि ‘ये हुआ’ तो….या फिर ‘वो जीता’ तो….सिर्फ और सिर्फ उसी के S.M.S  की वजह से”…

“और बन्दा बेचारा ये सोच…खुशी के मारे फूल के कुप्पा हुए जाता है कि….इस बेईमानी भरी जिंदगी में चलो एक नेक काम तो किया” …
“खाक!…अच्छा काम किया?…बीच बाज़ार….कोई खुलेआम…सबकी नज़रों के सामने कपड़े उतार ले गया और साहब को इल्म ही नहीं?…
उलटे खुशी खुशी के मारे तुरंत ही अगले S.M.S की तैयारी में जुटे दिखाई देते हैँ”…
लगता था कि आज सारा का सार गुस्सा इन नामाकूल चोरों पर ही निकल पडेगा कि अचानक कॉल बैल बजने की आवाज़ के साथ ही साले साहब के खुशी से चहकने की आवाज़ सुनाई दी …

“लो!…जीजा जी…मुँह मीठा करो” मिठाई का डिब्बा हाथ में लिए वो ख़ुशी के मारे उछल रहे थे
मिठाई देखते ही मुँह में पानी आ गया…. टूट पडा मिठाई पर…दो-चार टुकडे मुँह में धकेलने के बाद मैं डकार मारता हुआ बोला…

“किस खुशी में मिठाई बांटी जा रही है जनाब?”…

इस पर बीवी बोल पड़ी…”इतनी देर से यही तो गा रही हूँ लेकिन तुम्हारे पल्ले बात पड़े तब ना…ईनाम निकला है मेरे भाई का…. S.M.S भेजा था”

“अच्छा?…कितने का ईनाम निकला है?”..

“पूरे….पचास हज़ार का”…

“ओह!..ज़रा टीवी तो ओन करना” मैँ मोबाईल संभालता हुआ बोला

sms...

“क्यूँ?…क्या इरादा है जनाब का?” बीवी मंद-मंद मुस्काते हुए बोली
S.M.S भेजने का ही इरादा होना है..और भला किसका होना है?” मैँ झेंपता हुआ बोला

***राजीव तनेजा***

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